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Qazi Mujahidul Islam Qasmi : इस्लामिक न्यायशास्त्र के विख्यात विद्वान

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Qazi Mujahidul Islam Qasmi की पैदाइश बिहार के दरभंगा जिले में स्थित जाले गाँव में 9 अक्टूबर 1936 को हुआ था. क़ाज़ी साहब के पिता मौलाना अब्दुल अहद हजरत शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी के अच्छे शागिर्द थे. काजी साहब की बुनियादी शिक्षा घर पर ही हासिल हुई. उसके बाद उन्होंने मदरसा महमूदुल उलूम (दमला), मदरसा इम्दादिया (दरभंगा) और मदरसा दारूल उलूम (मऊ) होते हुए इस्लामी शिक्षा के सबसे बड़े इस्लामी केंद्र दारूल उलूम देवबंद गए और वहां चार साल तक तालीम हासिल की. 

क़ाज़ी मुजाहिदुल इस्लाम कासमी ने दारूल उलूम से फारिग होने के बाद मुंगेर के एक मदरसे में अध्यापक के तौर पर पढ़ाना शुरू कर दिया. क़ाज़ी साहब के पास पढ़ाने की कमाल की सलाहियत थी. पढ़ाने का ये सिलसिला 7 साल तक चला. उसके बाद इमारत शरिया पटना से जुड़ गये. उस वक़्त इमारत की हालत अच्छी नही थी. क़ाज़ी साहब के कोशिशों से इमारत शरिया एक आदर्श शरयी अदालत बन सका और मुस्लिम समुदाय में उसकी पहुँच काफी बढ़ी. जिसके बाद सरकार भी इमारत के फैसले को मान्यता देने लगी.

क़ाज़ी मुजाहिदुल इस्लाम कासमी ने इस्लामिक फ़िक्ह अकैडमी दिल्ली की 1989 में स्थापना की और आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड(1972) के सहसंस्थापक थे. काजी साहिब 1972 से ही बोर्ड के सक्रिय सदस्य रहे थे. 1999 में मौलाना अबुल हसन नादवी की मृत्यु के बाद उन्हें मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में सर्वसम्मति से चुना गया. वो लम्बे समय तक आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे.

वो क़ाज़ी साहब ही थे जिन्होंने भारत में शरिया आधारित इस्लामी अदालत की बुनियाद रखी और इसका दायरा देश भर में फैलाया. आज ये इस्लामिक अदालतें हजारों लोगों को बेहतर और आसान मशविरा देता है और लोग अदालतों की लम्बी और खर्चीली भाग दौर से बच जाते हैं. क़ाज़ी साहब द्वारा स्थापित ये महाविद्यालय सरकारी उपेक्षा का शिकार है उनके पास समुदाय के लिए सामाजिक और धार्मिक सेवाओं का विशाल अनुभव था.

काजी साहब इतनी बड़ी शख्सियत होने के बाद भी अपने आबाई गाँव जाले को कभी नही भूले. जाले के अमन-शान्ति और तरक्की में हमेशा उनके योगदान को नही भुलाया जा सकता है. उन्ही की कोशिशों से 1983-1984 में ही जाले में स्नातक तक की पढाई के लिए महाविद्यालय की स्थापना की गयी. क़ाज़ी साहब खुद से जाले और आसपास के गाँव में महाविद्यालय स्थापित करने के लिए चंदा इकठ्ठा करने निकले. चाहते तो वो सिर्फ अपनी कोशिशों से भव्य कॉलेज भवन बनवा सकते थे लेकिन चंदा इकठ्ठा करने के पीछे उनकी मंशा थी कि हर एक व्यक्ति को कॉलेज से अपना लगाव महसूस हो और सब इसका ज्यादा से ज्यादा फायेदा उठा सके. इन विद्यालयों से हर साल हजारों बच्चे शिक्षित होकर निकलते हैं लेकिन बिहार सरकार की उपेक्षा का शिकार होने की वजह से विद्यालय की आधारभूत सुविधाएँ आज भी यथास्थिति में है.

Qazi Mujahidul Islam Qasmi एक अजीम शख्सियत थे अपने 65 साल की जिंदगी में वो एक काबिल इस्लामिक जूरिस्ट (फकीह ) की हैसियत से याद रखे जायेंगे. वो एक शानदार लेखक भी थे. उनकी 50 से ज्यादा किताबें प्रकाशित हो चुकी है जो उर्दू, अरबी और अंग्रेजी जबानों में है.

सभी मामलों के लिए क़ाज़ी मुजाहिदुल इस्लाम कासमी का दृष्टिकोण वैज्ञानिक था. अपने तर्कसंगत अंदाज से हमेशा वो विद्वानों को कायल कर लेते थे. इस प्रकार उनकी लगन ने उन्हें स्पष्टता और दृढ़ विश्वास के साथ जटिल मुद्दों पर आगे बढकर हल करने के लिए सक्षम बनाया. समाज के लिए हमेशा फिक्रमंद रहने वाला भारत का ये सपूत 4 अप्रैल 2002 को इस दुनिया से रुखसत हो गया .

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